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Showing posts from September, 2020

मराठी मातीचा उपेक्षित वारसा...

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मराठी मातीचा उपेक्षित वारसा... -  April 28, 2020 '' स्वतःच्या इतिहास,उगम आणि संस्कृती याविषयी अनभिज्ञ व अज्ञानी असलेला  समाज म्हणजे मुळं नसलेला वृक्ष असतो '', असे प्रतिपादन प्रख्यात जमैयकन नीग्रो नेते मार्कस ग्रेव्ही ज्युनियर यांनी नीग्रो समाजाविषयी केलेले आहे. त्यांचा हा विचार भारतीय बहुजन समाजाला  देखील अत्यंत चपखलपणे लागू होतो.  भारतात बहुजनांचा इतिहास वा संस्कृतीच नव्हे तर त्यांचे तत्वज्ञान, वाङ्मय व भाषा यांचा वृक्षच नष्ट करण्याचा अथवा त्याचे बोन्साय करण्याचा प्रयत्न व प्रघात आर्याच्या आगमनापासून आजवर अस्तित्वात असलेला दिसतो. महाराष्ट्राच्या परिप्रेक्षात या भूमीत इसवीसनाच्या नवव्या शतकापासून झालेल्या घडामोडी जरी लक्षात घेतल्या ,तरी याची यथायोग्य प्रतीति येऊ शकते.  आज मराठी समाज,त्याची संस्कृती, त्याचे पुरोगामीत्व,भाषा,वाङ्मय,तत्वज्ञान,परंपरा,जनमानस अशा सर्व गोष्टींचे उगम व विकास याचे आदिकारण म्हणजे भागवत अथवा वारकरी संप्रदाय समजले जाते. असे समजण्यात काही वावगे देखील नाही. अखेर जे तत्वज्ञान व आचारपद्धती बहुसंख्य समाजाकडून,दीर्घकाळासाठी व अखंडपणे स्वीकारली जा...

अखेरचा हिंदू सम्राट...

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अखेरचा हिंदू सम्राट... -  May 20, 2020                 अखेरचा हिंदू सम्राट... प्राचीन काळापासून भारतीय जनमानस हे पारमार्थिक मानसिकता जोपासत आले आहे. यामुळे लौकिक जीवनाची नोंद ठेवण्याची आश्यकता आपल्याला कधी जाणवलीच नाही. याचा परिणाम आपण आपल्या गौरवशाली इतिहासाचे जतन केले नाही. यामुळे आपला गौरव वृद्धिंगत करणा-या आपल्या महानायकांचा इतिहास आपण विसरलो. भारताचा असाच एक उपेक्षित महानायक म्हणजे 'भारतेश्वर पृथ्वीराज चौहान'. त्याच्या जीवनावर प्रकाश टाकणारे तत्कालीन केवळ दोन ग्रंथ आज उपलब्ध आहेत. 'पृथ्वीराज रासो' आणि 'पृथ्वीराज विजय' हे दोन काव्य ग्रंथ हेच पृथ्वीराज चौहानाच्या इतिहासाचे प्रमुख स्त्रोत म्हणता येतात. हे काव्यग्रंथ असल्याने कवी कल्पनांमधून सत्य शोधण्याचे काम इतिहासकारांना करावे लागले. यामुळेच भारतीय व परकीय इतिहासकारांना पृथ्वीराजास योग्य न्याय देता आलेला नाही. इतिहासाच्या पटलावर ते एक उपेक्षित चरित्र ठरले. आपल्याला देखील संयोगितेचे हरण करणारा पृथ्वीराजच केवळ माहित असतो. वास्तविक पाहता सम्राट पृथ्वीराज एक महामानव, महान योद्धा, कुशल सेनानाय...

पहला हवाईजहाज भारत में बना ।

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प्राचीन सम्रद्ध भारत अस्तोमा सद्ग्मया| तमसोमा ज्योतिरग्मया| मृत्योर्मा अम्रुतान्गमया| ॐ शांति शांति शांतिही || बुधवार, 3 अप्रैल 2013 पहला हवाईजहाज भारत में बना । यदि में आप से पुछु की पहला हवाई जहाज किसने बनाया तो निश्चित तोर पर अधिक लोगो के मन में आयेगा  Wright brothers  का नाम आयेगा। परन्तु यह सत्य नही है।  आज के समय का दुनिया का पहला विमान  शिवकर बापूजी तलपडे   (1864–1916) ने बनाया था जो की मुंबई के रहने वाले थे  । तथा  P athare Prabhu community के सदस्य थे।  शिवकर  जी संस्कृत व वेदों के महान  ज्ञाता थे। उन्होंने उस विमान का नाम मारुतसखा  (मारुत  अर्थात  हवा, वायु ) (सखा का अर्थ मित्र ) रखा। मारुतसखा  शब्द का प्रयोग ऋग्वेद (7.92.2) में देवी सरस्वती के लिए प्रयुक्त हुआ है। सन  1895 में  उन्होंने इस विमान का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया और 1500 फुट की ऊंचाई तक उड़ाया । इनकी रचना का मुख्य आधार  महर्षि भारद्वाज रचित  ‘ विमान शास्त्र ‘  था  जैसा के हम जानते ...

वैदिक ग्रंथों में सोमरस

प्राचीन सम्रद्ध भारत अस्तोमा सद्ग्मया| तमसोमा ज्योतिरग्मया| मृत्योर्मा अम्रुतान्गमया| ॐ शांति शांति शांतिही || मंगलवार, 24 सितंबर 2013 वैदिक ग्रंथों में सोमरस (Meaning of Somras in Vedas) आधुनिक विद्वान वेदों में सोम रस की तुलना एक जड़ी बूटी से करते हैं जिसको ग्रहण करने से नशा हो जाता हैं. पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार वैदिक काल में सोम अर्थात शराब पीने का चलन था,वैदिक ऋषि सोम रस को ग्रहण कर नशे में झूम जाते थे. इस प्रकार से विधर्मी लोग वेदों में सामान्य जन की श्रद्धा को कम करने के लिए वेदों में सोम अर्थात शराब पीने का प्रावधान कहकर स्वयं तो अज्ञान में भटकतें रहते हैं और भारतियों को अज्ञानता के समुद्र में भटकने को विवश करने में सदियों से लगे हैं. ऋषि दयानंद ने अपने वेद भाष्य में सोम शब्द का अर्थ प्रसंग अनुसार ईश्वर, राजा, सेनापति, विद्युत्, वैद्य, सभापति, प्राण, अध्यापक, उपदेशक इत्यादि किया हैं. कुछ स्थलों में वे सोम का अर्थ औषधि, औषधि रस और सोमलता नमक औषधि विशेष भी करते हैं, परन्तु सोम को सूरा या मादक वास्तु के रूप में कहीं ग्रहण नहीं किया हैं. ऋग्वेद ९/११४/२ में सोम को लताओं का पति क...

महावस्तु प्रोग्रामिंग

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प्राचीन सम्रद्ध भारत अस्तोमा सद्ग्मया| तमसोमा ज्योतिरग्मया| मृत्योर्मा अम्रुतान्गमया| ॐ शांति शांति शांतिही || शुक्रवार, 27 सितंबर 2013 महावस्तु प्रोग्रामिंग (MahaVastu the ancient indian Programming system) Symbols are the formulator (sutradhar ) of the conscious and the sub-conscious mind. And man has had this innate knowledge from the very beginning, right with the creation of the world. According to linguists, development of language has taken place from symbols only. Symbols are an integral part of human life and mind, even today. The human sub-conscious mind understands only the language of symbols. The expansion of the sub-conscious mind is in two domains - first the sub-conscious mind of a human being and second the inner space of a building. The human mind evolves from the Space where he lives - the space inside the building. The philosophy of MahaVastu™ believes - Bhawna (emotion and intention) is the daughter of Bhavana (building). Emotion and intention are the driving force...

वैदिक काल गणना भाग - 1

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प्राचीन सम्रद्ध भारत अस्तोमा सद्ग्मया| तमसोमा ज्योतिरग्मया| मृत्योर्मा अम्रुतान्गमया| ॐ शांति शांति शांतिही || बुधवार, 3 अप्रैल 2013 वैदिक काल गणना भाग - 1 1. सम्वत्सर(hindu new year) की वैज्ञानिकता बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक पश्चिमी देशों में उनके अपने धर्म-ग्रन्थों के अनुसार मानव सृष्टि को मात्र पांच हजार वर्ष पुराना बताया जाता था। जबकि इस्लामी दर्शन में इस विषय पर स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहा गया है। पाश्चात्य जगत के वैज्ञानिक भी अपने धर्म-ग्रन्थों की भांति ही यही राग अलापते रहे कि मानवीय सृष्टि का बहुत प्राचीन नहीं है। इसके विपरीत हिन्दू जीवन-दर्शन के अनुसार इस सृष्टि का प्रारम्भ हुए १ अरब, ९७ करोड़, २९ लाख, ४९ हजार, १० वर्ष बीत चुके हैं और अब चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से उसका १ अरब, ९७ करोड़, २९ लाख, ४९ हजार, ११वां वर्ष प्रारम्भ हो रहा है। भूगर्भ से सम्बन्धित नवीनतम आविष्कारों के बाद तो पश्चिमी विद्वान और वैज्ञानिक भी इस तथ्य की पुष्टि करने लगे हैं कि हमारी यह सृष्टि प्राय: २ अरब वर्ष पुरानी है। अपने देश में हेमाद्रि संकल्प में की गयी सृष्टि की व्याख्या के आधार पर इस समय स्वायम्...

द्विआधारीय गणित (Binary Number System) के जनक : महर्षि पिंगल

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प्राचीन सम्रद्ध भारत अस्तोमा सद्ग्मया| तमसोमा ज्योतिरग्मया| मृत्योर्मा अम्रुतान्गमया| ॐ शांति शांति शांतिही || बुधवार, 3 अप्रैल 2013 द्विआधारीय गणित (Binary Number System) के जनक : महर्षि पिंगल महर्षि  पिंगल  का जन्म लगभग 400 ईसा पूर्व का माना जाता है । कई इतिहासकार इन्हें महर्षि  पाणिनि  का छोटा भाई मानते है | महर्षि पिंगल उस समय के महान लेखकों में एक थे । इन्होने  छन्दःशास्त्र  (छन्दःसुत्र) की रचना की ।  छन्दःशास्त्र आठ अलग अलग अध्यायों में विभक्त है | आठवे अध्याय में पिंगल ने छंदों को संक्षेप करने तथा उनके वर्गीकरण के बारे में लिखा । तथा द्विआधारीय  रचनाओं को गणितीय रूप में लिखने के बारे में बताया । तथा इनके छंदों की लम्बाई नापने के लिए  वर्णों की लम्बाई या उसे उच्चारित (बोलने) में लगने वाले समय के आधार पर उसे दो भागों में बांटा :- गुरु (बड़े के लिए) तथा लधु (छोटे के लिए) | इसके लिए सर्व प्रथम एक पद (वाक्य) को वर्णों में विभाजित करना होता है विभाजित करने हेतु निम्न नियम दिए गये है : 1. एक वर्ण में स्वर (vowel) अवश्य होना चाहिए तथा इसम...

मक्का मे शिवलिंग

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प्राचीन सम्रद्ध भारत अस्तोमा सद्ग्मया| तमसोमा ज्योतिरग्मया| मृत्योर्मा अम्रुतान्गमया| ॐ शांति शांति शांतिही || शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013 मक्का मे शिवलिंग (ShivLinga in Macca) स्व. मौलाना मुफ्ती अब्दुल कयूम जालंधरी संस्कृत ,हिंदी,उर्दू ,… फारसी व अंग्रेजी के जाने-माने विद्वान् थे। अपनी पुस्तक “गीता और कुरआन “में उन्होंने निशंकोच स्वीकार किया है कि, “कुरआन” की सैकड़ों आयतें गीता व उपनिषदों पर आधारित हैं। मोलाना ने मुसलमानों के पूर्वजों पर भी काफी कुछ लिखा है । उनका कहना है कि इरानी “कुरुष ” ”कौरुष “व अरबी कुरैश मूलत: महाभारत के युद्ध के बाद भारत से लापता उन २४१६५ कौरव सैनिकों के वंसज हैं, जो मरने से बच गए थे। अरब में कुरैशों के अतिरिक्त “केदार” व “कुरुछेत्र” कबीलों का इतिहास भी इसी तथ्य को प्रमाणित करता है। कुरैश वंशीय खलीफा मामुनुर्र्शीद (८१३-८३५) के शाशनकाल में निर्मित खलीफा का हरे रंग का चंद्रांकित झंडा भी इसी बात को सिद्ध करता है। कौरव चंद्रवंशी थे और कौरव अपने आदि पुरुष के रूप में चंद्रमा को मानते थे। यहाँ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि इस्लामी झंडे में चंद्रमां के ऊपर “अल्लुज़ा” अर्ताथ...

मिल गई भगवान श्री कृष्ण की नगरी: द्वारिका

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प्राचीन सम्रद्ध भारत अस्तोमा सद्ग्मया| तमसोमा ज्योतिरग्मया| मृत्योर्मा अम्रुतान्गमया| ॐ शांति शांति शांतिही || बुधवार, 3 अप्रैल 2013 मिल गई भगवान श्री कृष्ण की नगरी: द्वारिका महाभारत के समय (लगभग 7000 वर्ष पूर्व) श्री कृष्ण की जिस दवारिका नगरी का उल्लेख महाभारत ग्रन्थ, भागवत पुराण आदि में मिलता है वो नगरी गुजरात के निकट  समुद्र की गहराइयों में पाई गई है । महाभारत में इस नगरी के बारे में विस्तृत वर्णन मिलता है की श्री कृष्ण के आदेश पर देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा ने दवारिका समुद्र के मध्य में बसाई थी । परन्तु अब तक पुराणों में वर्णित भोगोलिक संकेतों का अनुसरण करने के पश्चात भी उस स्थान पर कोई  ऐसी नगरी नही पाई गई। इसी  कारण कई मतान्तरों में इस नगरी को काल्पनिक माना गया कहा गया की कभी ऐसी समुद्र पर स्थित नगरी थी ही नही। किन्तु अपने वो कहावत तो सुनी ही होगी "सांच को आंच क्या ?  " भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण    के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि गुजरात में समुद्र नारायण मंदिर के आसपास के इलाके को आज द्वारिका के नाम से जाना जाता है। काफी समय से ज...