हिंदुओं की सबसे बड़ी कमी क्या है ?

हिंदुओं की सबसे बड़ी कमी क्या है ?

मेरा स्पष्ट मानना रहा है कि हिंदुओं की सबसे बड़ी कमी ये है कि "हिन्दु वैचारिक रुप से विकलांग है" ।

हमारे धर्माचार्य / आचार्य तथाकथित गुरुकुल हिंदुओं को  "सनातन धर्म" की सुस्पष्ट, सुसंगठित व्याख्या देने में असफल रहे हैं और सही कहूँ तो असफल ही नहीं बल्कि प्रयास ही नहीं किये गए हैं -

आज हिंदुओं के धर्माचार्य - आचार्य , लेखक  प्रेस और तथाकथित गुरुकुल संप्रदायों में बंटे हैं - वे सनातन का नहीं बल्कि अपने अपने संप्रदायों  ( जैसे शैव सम्प्रदाय , वैष्णव सम्प्रदाय  , लिंगायत , राधास्वामी , आर्य समाज , गायत्री परिवार ,शाक्त सम्प्रदाय ,  रामकृष्ण मिशन, ब्रह्मकुमारी , शांकर-सम्प्रदाय“ रामानंद-सम्प्रदाय , श्रीसम्प्रदाय , मध्व-सम्प्रदाय , कबीर पंथी आदि आदि ) की विचारधारा को फैलाने में ही अपनी शक्ति और ऊर्जा लगाते हैं।
सनातन , संप्रदायों में बँटकर खंडित हो चुका है।
और सम्प्रदाय की विचारधारा में जकड़े धर्माचार्यों में ये सामर्थ्य नहीं कि वे सनातन का सृजन कर सकें क्योंकि सनातन के सृजन के लिए वैचारिक बंधनों और सीमाओं को तोड़कर यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः अर्थात तर्क और अनुसन्धान से सनातन को जाना जा सकेगा परन्तु सम्प्रदायों के विचारों की सीमाओं में बंधे 
धर्माचार्य / आचार्य तथाकथित गुरुकुल सनातन का न कर सकेगें।

 "सनातन धर्म" के मूलभूत सिद्धांतों को सामान्य हिन्दु तक पहुंचाने की दिशा में धर्माचार्य / आचार्य तथाकथित गुरुकुलों ने तनिक प्रयास सदियों से नहीं किये हैं । इन्होंने मात्र अपने अपने गुरुओं और अपने अपने सम्प्रदायों को प्रचारित करने का कार्य किया है इस कारण समाज में सनातन के प्रति अलग-अलग विचारों और मतों से भरे कोई एकरूपता नहीं , स्पष्टता नहीं। 

धार्मिक संथाओं और व्यक्तियों द्वारा 
"सनातन के मूलभूत सिद्धांतों" को जन मानस तक न पहुंचाना और सरकारी शिक्षा में सनातन की कोई भूमिका ही न होना ऐसे दो कारण हैं जिनके कारण
एक अनपढ़ - निरक्षर व्यक्ति से लेकर बड़ी बड़ी डिग्रियों वाला , देश दुनिया की समझ रखने वाला , डॉक्टर-इंजीनियर , वकील , जज से लेकर बड़े बड़े पदों पर आसीन अधिकारी तक "सनातन के प्रति" अनर्गल/विरोधी विचारों से भरे मिलते हैं।

इस कारण हिन्दु धार्मिक छोड़िए राजनैतिक रुप से भी एकमत नहीं होते, एक झंडे के तले , यहूदियों की तरह हिन्दुराष्ट्र के लिए महतावाकांक्षी नहीं बनते , अपनी संस्कृति-सभ्यता की रक्षा के लिए एक सुर में आवाज उठाते हुए नहीं दिखते इसलिए हम सदियों से पदाक्रांत होते रहे हैं , विरासत का विध्वंस झेलते रहे हैं , भारत को खंडित होते हुए देखते रहे पर गिनती के योद्धाओं के द्वारा हाथ-पैर मारने और चिल्लाने के अलावा कुछ कर न सके।

हिंदुओं की "वैचारिक विकलांगिता" के कारण ही कोई भी आकर हिंदुओं को बौद्ध-अम्बेडकरवादी बना लेता है , कोई ईसाई बना लेता है , हमारे बच्चों को कम्युनिस्ट बना लेता है , कोई भी जेहादी आकर हिन्दु लड़कियों के साथ लव जेहाद कर लेता है।

 और सोचिये  क्या हम इस शिक्षा के रहते अपने युवाओं को अब बचा पायेगें।
#हिन्दू_जागरण

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