छत्रपति शिवाजी महाराज: जीवनी, इतिहास और प्रशासन

छत्रपति शिवाजी महाराज: जीवनी, इतिहास और प्रशासन

शिवाजी, भारत में मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे. शिवाजी की जन्मतिथि को लेकर मतभेद हैं. कुछ इतिहासकार इनका जन्म 19 फ़रवरी,1630 मानते हैं तो कुछ अप्रैल 1627 मानते हैं. आइये इस लेख में शिवाजी की जीवनी और अन्य घटनाओं के बारे में जानते हैं.
FEB 20, 2020 11:27 IST
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Shivaji Maharaj: Imaginary Picture
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छत्रपति शिवाजी महाराज निर्विवाद रूप से भारत के सबसे महान राजाओं में से एक हैं. उनकी युद्ध प्रणालियाँ आज भी आधुनिक युग में अपनायीं जातीं हैं. उन्होंने अकेले दम पर मुग़ल सल्तनत को चुनौती दी थी.

शिवाजी के बारे में तथ्यात्मक जानकारी (Factual Information about the Shivaji)

नाम: शिवाजी भोंसले

जन्म तिथि: 19 फरवरी, 1630 या अप्रैल 1627

जन्मस्थान: शिवनेरी किला, पुणे जिला, महाराष्ट्र

पिता: शाहजी भोंसले  

माता: जीजाबाई

शासनकाल: 1674–1680

जीवनसाथी: साईबाई, सोयाराबाई, पुतलाबाई, सकवरबाई, लक्ष्मीबाई, काशीबाई

बच्चे: संभाजी, राजाराम, सखुबाई निम्बालकर, रणुबाई जाधव, अंबिकाबाई महादिक, राजकुमारबाई शिर्के

धर्म: हिंदू धर्म

मृत्यु: 3 अप्रैल, 1680

शासक: रायगढ़ किला, महाराष्ट्र

उत्तराधिकारी: संभाजी भोंसले

शिवाजी महाराज योद्धा राजा थे और अपनी बहादुरी, रणनीति और प्रशासनिक कौशल के लिए प्रसिद्ध थे. उन्होंने हमेशा स्वराज्य और मराठा विरासत पर ध्यान केंद्रित किया था. 
शिवाजी महाराज, शाहजी भोंसले और जीजा बाई के पुत्र थे.उन्हें पूना में उनकी माँ और काबिल ब्राहमण दादाजी कोंडा-देव की देखरेख में पाला गया जिन्होंने उन्हें एक विशेषज्ञ सैनिक और एक कुशल प्रशासक बनाया था. 
शिवाजी महाराज, गुरु रामदास से धार्मिक रूप से प्रभावित थे, जिन्होंने उन्हें अपनी मातृभूमि पर गर्व करना सिखाया था.

17वीं शताब्दी की शुरुआत में नए योद्धा वर्ग मराठों का उदय हुआ, जब पूना जिले के भोंसले परिवार को सैन्य के साथ-साथ अहमदनगर साम्राज्य का राजनीतिक लाभ मिला था. भोंसले ने अपनी सेनाओं में बड़ी संख्या में मराठा सरदारों और सैनिकों की भर्ती की थी जिसके कारण उनकी सेना में बहुत अच्छे लड़ाके सैनिक हो गये थे.

शिवाजी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ (Important events in Shivaji’s Life)

टोरणा की विजय (Conquest of Torana): यह मराठाओं के सरदार के रूप में शिवाजी द्वारा कब्जा किया गया पहला किला था. उन्होंने यह जीत महज 16 साल की उम्र में हासिल कर वीरता और दृढ़ संकल्प से अपने शासन की नींव रखी.

टोरणा की विजय ने शिवाजी को रायगढ़ और प्रतापगढ़ फतह करने के लिए प्रेरित किया और इन विजयों के कारण बीजापुर के सुल्तान को चिंता हो रही थी कि अगला नंबर उसके किले का हो सकता है और उसने शिवाजी के पिता शाहजी को जेल में डाल दिया था.

पानीपत की लड़ाई किसके बीच और कब हुई?

ईस्वी 1659 में, शिवाजी ने बीजापुर पर हमला करने की कोशिश की, फिर बीजापुर के सुल्तान ने अपने सेनापति अफजल खान को 20 हजार सैनिकों के साथ शिवाजी को पकड़ने के लिए भेजा, लेकिन शिवाजी ने चतुराई से अफजल खान की सेना को पहाड़ों में फंसा लिया और बागनाख या बाघ के पंजे नामक घातक हथियार से अफजल खान की हत्या कर दी थी. 
अंत में, 1662 में, बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के साथ एक शांति संधि की और उन्हें अपने विजित प्रदेशों का एक स्वतंत्र शासक बना दिया.

कोंडाना किले की विजय (Conquest of Kondana fort): यह किला नीलकंठ राव के नियंत्रण में था. इसको जीतने के लिए मराठा शासक शिवाजी के कमांडर तानाजी मालुसरे और जय सिंह प्रथम के किला रक्षक उदयभान राठौड़ के बीच युद्ध हुआ था. इस युद्ध में तानाजी मालुसरे की मौत हो गयी थी लेकिन यह मराठा यह किला जीतने में कामयाब रहे थे. इन्ही तानाजी मालसुरे के ऊपर एक फिल्म बनी है जो कि सुपरहिट हुई है.

शिवाजी का राज्याभिषेक: 1674 ई. में, शिवाजी ने खुद को मराठा साम्राज्य का स्वतंत्र शासक घोषित किया और उन्हें रायगढ़ में छत्रपति शिवाजी के रूप में ताज पहनाया गया था. उनका राज्याभिषेक मुगल सल्तनत के लिए चुनौती बन गया था.

राज्याभिषेक के बाद, उन्हें हैडवा धर्मोधरका ’(हिंदू धर्म के रक्षक) का खिताब मिला था. यह ताजपोशी लोगों को भू-राजस्व इकट्ठा करने और कर लगाने का वैध अधिकार देती है.

शिवाजी का प्रशासन (Shivaji’s Administration)

शिवाजी का प्रशासन काफी हद तक डेक्कन प्रशासनिक प्रथाओं से प्रभावित था. उन्होंने आठ मंत्रियों को नियुक्त किया जिन्हें 'अस्तप्रधान' कहा गया था, जो उन्हें प्रशासनिक मामलों में सहायता प्रदान करते थे.उनके शासन में अन्य पद थे;

1. पेशवा: सबसे महत्वपूर्ण मंत्री थे जो वित्त और सामान्य प्रशासन की देखभाल करते थे.

2. सेनापति: ये मराठा प्रमुखों में से एक थे. यह काफी सम्मानीय पद था. 

3. मजूमदार (Majumdar): ये अकाउंटेंट होते थे.

4. सुरनवीस या चिटनिस (Surnavis or chitnis):अपने पत्राचार से राजा की सहायता करते थे.

5. दबीर (Dabir): समारोहों के व्यवस्थापक थे और विदेशी मामलों से निपटने में राजा की मदद करते थे.

6. न्यायधीश और पंडितराव: न्याय और धार्मिक अनुदान के प्रभारी थे.

इस प्रकार शिवाजी की जीवनी पढने से स्पष्ट है कि वे एक न केवल एक कुशल सेनापति, एक कुशल रणनीतिकार और एक चतुर कूटनीतिज्ञ था बल्कि एक कट्टर देशभक्त भी थे. उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए औरंगजेब जैसे बड़े मुग़ल शासक से भी दुश्मनी की थी.

9 रोचक तथ्य छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में

जानें तानाजी मालुसरे की शौर्यगाथा और सिंहगढ़ किले की लड़ाई के बारे में


9 रोचक तथ्य छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में

छत्रपति शिवाजी महाराज को शिवाजी या शिवाजी राजे भोसले के नाम से भी जाना जाता है | उनका जन्म 19 फरवरी, 1630 में शिवनेरी दुर्ग जो कि पुणे जुन्नर नगर में शाहजी भोंसले की पत्नी जीजाबाई (राजमाता जिजाऊ) की कोख से हुआ था| वह भारत के महान योद्धा एवं रणनीतिकार थे| इस लेख में छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में कुछ रोचक तथ्यों को जानेंगे |
FEB 6, 2020 11:09 IST
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छत्रपति शिवाजी महाराज को शिवाजी या शिवाजी राजे भोसले के नाम से भी जाना जाता है | उनका जन्म 19 फरवरी, 1630 में शिवनेरी दुर्ग जो कि पुणे जुन्नर नगर में शाहजी भोंसले की पत्नी जीजाबाई (राजमाता जिजाऊ) की कोख से हुआ था| उनके पिताजी शहाजी राजे भोसले बीजापुर के दरबार में उच्चाधिकारी थे| शिवाजी का लालन पालन उनकी माताजी जीजाबाई जी की देखरेख में हुआ तथा उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण और प्रशासन की समझ दादोजी कोंडदेव जी से मिली थी| वह भारत के महान योद्धा एवं रणनीतिकार थे और हम सब जानते है की उनके नाम से मुग़ल काँपते थे|1674 में उन्होंने पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी थी।

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Source: www.shivajijayanti.com

आइये छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में कुछ रोचक तथ्यों पर नज़र डालते है:

1 शिवाजी बहुत बुद्धिमान थे और उन्हे यह कतई मंजूर नहीं था की लोग जात पात के झगड़ों में उलझे रहे| वह किसी भी धर्म के खिलाफ नही थे | उनका  नाम भगवान शिव के नाम से नही  अपितु एक क्षेत्रीय देवता शिवाई (Shivai) से लिया गया है।

2 उन्होंने एक शक्तिशाली नौसेना का निर्माण किया था | इसलिए उन्हें भारतीय नौसेना के पिता के रूप में जाना जाता है| अपने प्रारंभिक चरणों में ही उनको नौसैनिक बल के महत्व का एहसास हो गया था | क्योंकि उन्हें यकीन था कि यह डच, पुर्तगाली और अंग्रेजों सहित विदेशी आक्रमणकारियों से स्वतंत्र रखेगा और समुद्री डाकुओं से कोंकण तट की भी रक्षा करेगा| यहाँ तक कि उन्होंने जयगढ़, विजयदुर्ग, सिन्धुदुर्ग और अन्य कई स्थानों पर नौसेना किलों का निर्माण किया। क्या आपको पता है कि उनके पास चार अलग-अलग प्रकार के युद्धपोत भी थे जैसे मंजुहस्म पाल्स (Manjuhasm Pals), गुरब्स (Gurabs) और गल्लिबट्स (Gallibats)|

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Source: www.s-media-cache-ak0.pinimg.com

3 शिवाजी युद्ध की रणनीति बनाने में माहिर थे और सीमित संसाधनों के होने के बावजूद छापेमारी युद्ध कौशल का परिचय उन्होने तब दिया जब बहुत ही कम उम्र मात्र 15 साल में 'तोरनाकिले पर कब्जा करके बीजापुर के सुल्तान को पहला तगड़ा झटका दिया था। 1655 आते आते उन्होने एक के बाद एक कोंडन, जवली और राजगढ़ किलों पर कब्जा कर धीरे धीरे सम्पूर्ण कोकण और पश्चिमी घाट पर कब्जा जमा लिया था |

4 क्या आप जानते है कि बीजापुर को जीतने के लिएशिवाजी ने औरंगजेब की सहायता के लिए हाथ आगे भड़ाया था | पर ऐसा हो ना सका क्योंकि अहमदनगर के पास मुगल क्षेत्र में दो अधिकारियों ने छापा मार दिया था |

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Source: www.topyaps.com

शिवाजी के उत्तराधिकारी

5 वह शिवाजी थेजिन्होंने मराठों की एक पेशेवर सेना का गठन किया| इससे पहले मराठों की कोई अपनी सेना नही थी | उन्होंने एक औपचारिक सेना जहा कई सैनिकों को उनकी सेवाओं के लिए साल भर का भुगतान किया गया उसका गठन किया था। मराठा सेना कई इकाइयों में विभाजित थी और प्रत्येक इकाई में 25 सैनिक थे। हिंदू और मुस्लिम दोनों को बिना किसी भेदभाव के सेना में नियुक्त किया जाता था।

6 वह महिलाओं के सम्मान के कट्टर समर्थक थे | शिवाजी ने महिलाओं के खिलाफ दृढ़ता से उन पर हुई हिंसा या उत्पीड़न का विरोध किया था | उन्होंने सैनिकों को सख्त निर्देश दिये थे कि छापा मारते वक्त किसी भी महिला को नुकसान नही पहुचना चाहिए | यहा तक कि अगर कोई भी सेना में महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करते वक्त पकड़ा गया तो गंभीर रूप से उसे दंडित किया जाएगा |

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Source: www.i2.wp.com

7 पन्हाला किले (Panhala fortकी घेराबंदी से भागने में शिवाजी कामियाब हुए थे | इसके पीछे एक कहानी है वो ये कि जब शिवाजी महाराज सिद्दी जौहर की सेना द्वारा पन्हाला किला में फँस गये थे, तब इससे बचने के लिए उन्होंने एक योजना तैयार की और फिर उन्होंने दो पालकियों की व्यवस्था की जिसमें एक नाई शिव नहावीं को बिठा दिया जो बिकुल शिवाजी की तरह दिखता था और उसे किले से बाहर का नेतृत्व करने के लिए जाने को कहा,इतने में दुशमन के सैनिक नकली पालकी के पीछे चले गए और इस तरह से वह 600 सैनोकों को चकमा देकर भागने में कामियाब हुए |

8 वह गुरिल्ला युद्ध के प्रस्तावक थे | उनको पहाडों का चूहा कहा जाता था क्योंकि वह अपने इलाके की भूगोलिक,गुरिल्ला रणनीति या गनिमी कावा जैसे की छापा मरना, छोटे समूहों के साथ दुश्मनो पे हमला करना आदि अच्छी तरह से वाकिफ थे | उन्होंने कभी भी धार्मिक स्थानों या वहा पे रहने वाले लोगो के घरो में कभी छापा नही मारा |

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Source:www.upload.wikimedia.org

9 उनकी खासियत थी की वह अपने राज्य के लिए बादमें लड़ते थे पहले भारत के लिए लड़ते थे | उनका लक्ष्य था नि: शुल्क राज्य की स्थापना करना और हमेशा से अपने सैनिकों को प्रेरित करना की वह भारत के लिए लड़े और विशेष रूप से किसी भी राजा के लिए नहीं |

शिवाजी के बारे में और पढ़े

शिवाजी

सत्रहवी सदी के प्रारंभिक वर्षों में जब पूना जिले के भोंसले परिवार ने स्थानीय निवासी होने का लाभ उठाते हुए अहमदनगर राज्य से सैनिक व राजनीतिक लाभ प्राप्त किये तो एक नई लड़ाकू जाति का उदय हुआ जिसे ‘मराठा’ कहा गया. उन्होंनें बड़ी संख्या में मराठा सरदारों और सैनिकों को अपनी सेनाओं में भर्ती किया.शिवाजी शाह जी भोंसले और जीजा बाई के पुत्र थे. शिवाजी का पालन-पोषण पूना में उनकी माता और एक योग्य ब्राह्मण दादाजी कोंडदेव के देख-रेख में हुआ था.
OCT 24, 2015 11:56 IST
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सत्रहवी सदी के प्रारंभिक वर्षों में जब पूना जिले के भोंसले परिवार ने स्थानीय निवासी  होने का लाभ उठाते हुए अहमदनगर राज्य से सैनिक व राजनीतिक लाभ प्राप्त किये तो एक नई लड़ाकू जाति का उदय हुआ जिसे ‘मराठा’ कहा गया. उन्होंनें बड़ी संख्या में मराठा सरदारों और सैनिकों को अपनी सेनाओं में भर्ती किया.शिवाजी शाह जी भोंसले और जीजा बाई  के पुत्र थे.शिवाजी का पालन-पोषण पूना में उनकी माता और एक योग्य ब्राह्मण दादाजी कोंडदेव के देख-रेख में हुआ था. दादाजी कोंडदेव ने शिवाजी को एक अनुभवी योध्दा और सक्षम प्रशासक बनाया. शिवाजी गुरु रामदास के धार्मिक प्रभाव में भी आये,जिसने उनमे अपनी जन्मभूमि के प्रति गौरव भाव जाग्रत किया.

शिवाजी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ

  • तोरण की विजय: यह मराठा सरदार के रूप में शिवाजी द्वारा कब्जाया गया पहला किला था, जिसने सोलह वर्षा की उम्र में ही उनमें निहित पराक्रम,दृढ़निश्चय और शासकीय गुणों का परिचय दे दिया.इस जीत ने उन्हें रायगढ़ और प्रतापगढ़ जैसे किलों पर कब्ज़ा करने के लिये  प्रेरित किया. शिवाजी की इन जीतों से परेशां होकर बीजापुर के सुल्तान ने उनके पिता शाहजी को कैद में डाल दिया. 1659 ई. में,जब शिवाजी ने पुनः बीजापुर पर आक्रमण करने का प्रयास किया,तो बीजापुर के सुल्तान ने अपने सेनापति अफजल खान को शिवाजी को पकड़ने के लिये भेजा लेकिन शिवाजी भागने में सफल रहे और अफजल खान की,अपने ‘बाघनख’ या ‘शेर का पंजा’ कहे जाने वाले खतरनाक हथियार से,हत्या कर दी. अंततः 1662 ई. में बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के साथ शांति समझौता कर लिया और शिवाजी को उनके द्वारा जीते

गए क्षेत्रों का स्वतंत्र शासक बना दिया.

  • कोंडाना किले की जीत: यह किला नीलकंठ राव के नियंत्रण में था जिसके लिए मराठा शासक शिवाजी के सेनापति तानाजी मालसुरे और जय सिंह के अधीन किलेदार उदयभान राठौर के बीच युद्ध हुआ.
  • शिवाजी का राज्याभिषेक: 1674 ई. में रायगढ़ में शिवाजी ने खुद को मराठा राज्य का स्वतंत्र शासक घोषित किया और ‘छत्रपति’ की उपाधि धारण की. उनका राज्याभिषेक मुग़ल आधिपत्य को चुनौती देने वाले लोगों के उत्थान का प्रतीक था.राज्याभिषेक के बाद उन्होंने नव-निर्मित ‘हिन्दवी स्वराज्य’ के शासक के रूप में ‘हैन्दव धर्मोद्धारक’ (हिन्दू आस्था का संरक्षक) की उपाधि धारण की. इस राज्याभिषेक ने शिवाजी को भू-राजस्व वसूलने और लोगों पर कर लगाने का वैधानिक अधिकार प्रदान कर दिया.
  • गोलकुंडा के कुतुबशाही शासकों के साथ गठबंधन: इस गठबंधन के सहयोग से उन्होंने बीजापुर,कर्नाटक (1676-79ई.) पर चढाई की और जिंजी,वेल्लोर और कर्नाटक के कई अन्य किलों को जीता.

शिवाजी का प्रशासन

शिवाजी का प्रशासन दक्कन के प्रशासन से काफी प्रभावित था. उसने आठ मंत्रियों को नियुक्त किया जिन्हें ‘अष्टप्रधान’कहा जाता था. ‘अष्टप्रधान’ उसे प्रशासनिक कार्यों के सम्बन्ध में सलाह प्रदान करते थे.

  • ‘पेशवा’ सबसे प्रमुख मंत्री था जो वित्त और सामान्य प्रशासन की देख-रेख करता था.
  • ‘सेनापति’(सर-ए-नौबत) सेना की भर्ती,संगठन,रसद आपूर्ति की देख-रेख करता था.
  • ‘मजमुआदर’ आय-व्यय के लेखों की जाँच करता था.
  • ‘वाकिया-नवीस’ आसूचना एवं गृह कार्यों की देख-रेख करता था.
  • ‘शुर-नवीस’ या ‘चिटनिस’ राजा को राजकीय पत्र-व्यवहार में सहयोग प्रदान करता था.
  • ‘दबीर’ राजा को विदेश कार्यों में सहायता प्रदान करता था.
  • ‘न्यायाधीश’ और ‘पंडितराव’ न्याय और धर्मार्थ अनुदानों के प्रमुख थे.

उसने भूमि पर भू-राजस्व के एक-चौथाई की दर से शुल्क लगाया जिसे ‘चौथ’ या ‘चौथाई’ कहा गया. शिवाजी ने स्वयं को न केवल एक कुशल रणनीतिकार,योग्य सेनापति और चतुर कूटनीतिज्ञ के रूप में साबित किया बल्कि देशमुखी की शक्तियों का प्रयोग कर एक शक्तिशाली राज्य की नींव रख दी.

निष्कर्ष

अतः मराठों का उदय सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक और संस्थागत कारकों का सम्मिलित परिणाम था.जहाँ तक शिवाजी की बात है तो वे एक प्रसिद्ध शासक थे जिन्होंने मुग़ल अतिक्रमण के विरुद्ध जन-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व किया. हालाँकि मराठा प्राचीन जाति थी लेकिन सत्तरहवीं सदी ने उन्हें स्वयं को शासक के रूप में स्थापित होने का अवसर प्रदान किया.

जानें तानाजी मालुसरे की शौर्यगाथा और सिंहगढ़ किले की लड़ाई के बारे में.

क्या आपने तानाजी मालुसरे के बारे में सुना या पढ़ा है? वे कौन थे? भारतीय इतिहास में उन्हें क्यों याद किया जाता है? आइये इस लेख के माध्यम से जानते हैं.
JAN 9, 2020 18:21 IST

About Tanaji Malusare
About Tanaji Malusare

तानाजी मालुसरे, सिंह नाम से भी जाने जाते थे. 1670 में सिंहगढ़ की लड़ाई में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई थी. वैसे तो भारत के इतिहास में काफी लड़ाईयां हुई हैं जो कई योद्धाओं ने वीरता से लड़ी और जीती भी. ऐसे में कई योद्धाओं ने अपनी जान भी गवाई हैं. इन्हीं योद्धाओं में से एक हैं तानाजी मालुसरे.  हाल ही में तानाजी मालुसरे पर मूवी रिलीज़ होने वाली है और इसलिए ये नाम आजकल और भी चर्चा में है.

आखिर तानाजी मालुसरे कौन थे?

तानाजी मालुसरे बहादुर और प्रसिद्ध मराठा योद्धाओं में से एक हैं और एक ऐसा नाम है जो वीरता का पर्याय है. वे महान शिवाजी के दोस्त थे. उनको 1670 में सिंहगढ़ की लड़ाई के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है, जहां उन्होंने मुगल किला रक्षक उदयभान राठौर के खिलाफ अपनी आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी थी, जिसने मराठाओं के जीत का मार्ग को प्रशस्त किया था.

उनकी वीरता और बल के कारण शिवाजी उन्हें 'सिंह' कहा करते थे. तानाजी मालुसरे का जन्म 1600 ईस्वी में गोडोली, जवाली तालुका, सतारा जिला, महाराष्ट्र में हुआ था. उनके पिता का नाम सरदार कोलाजी और माता का नाम पार्वतीबाई था. उनके भाई का नाम सरदार सूर्याजी था.

9 रोचक तथ्य छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में

आइये अब सिंहगढ़ की लड़ाई के बारे में जानते हैं.

तानाजी मालुसरे के पुत्र के विवाह की तैयारियां चल रही थीं. चारो ओर उलास का वातावरण था. वे शिवाजी महाराज और उनके परिवार को शादी में आने का न्योता देने गए थे तभी उनको पता चला कि शिवाजी महाराज कोंधाना किला जो कि सिंहगढ किले के नाम से जाना जाता है वापिस मुगलों से पाना चाहते हैं. पहले सिंहगढ़ किले का नाम कोंधाना हुआ करता था.

1665 में, पुरंदर की संधि के कारण शिवाजी महाराज को कोंधाना किला मुगलों को देना पड़ा. कोंधाना, पुणे के पास स्थित, सबसे भारी किलेबंदी और रणनीतिक रूप से रखा गया किला था. इस संधि के बाद मुगलों की तरफ से राजपूत, अरब और पठान की टुकड़ी किले की रक्षा किया करती थी. इसमें सबसे सक्षम सेनापति उदयभान राठौर था और दुर्गपाल भी, जिसे मुगल सेना प्रमुख जय सिंह प्रथम ने नियुक्त किया था.

शिवाजी के आदेश के बाद तानाजी लगभग 300 सेना लेकर किले को फतेह करने के लिए चल दिए. उनके साथ उनका भाई तथा अस्सी वर्षीय शेलार मामा भी गए थे. किले की दीवारें इतनी ऊँची थीं कि उन पर आसानी से चढ़ना मुमकिन नहीं था. चढ़ाई बिलकुल सीधी थी.

यहीं आपको बता दें कि उदयभान के नेतृत्व में 5000 मुगल सैनिकों द्वारा किले की रक्षा की गई थी. एकमात्र किले का वो हिस्सा जहां मुगल सेना नहीं थी वो एक ऊँची लटकती हुई चट्टान के ऊपर था.

ऐसा कहा जाता है कि तानाजी अपने एक पालतू जानवर जो कि एक विशालकाय छिपकली थी की मदद से उस ऊँची चट्टान पर अपने सैनिकों के साथ चढ़ने में कामियाब हुए और मुगल सैनिकों पर हमला किया. इस हमले के बारे में उदयभान और मुगल सैनिक बेखबर थे. लड़ाई में तानाजी उदयभान द्वारा मारे गए और वीरगति को प्राप्त हुए. परन्तु उनके शेलार मामा ने तानाजी के बाद लड़ाई की कमान संभाली और उदयभान का वध किया. अंत में मराठाओं द्वारा किले पर कब्ज़ा कर ही लिया गया. आखिरकार मराठाओं को तानाजी के शौर्य और सूझ-भुझ के कारण विजय प्राप्त हुई और सूर्योदय होते-होते कोंधाना किले पर भगवा ध्वज फहरा दिया गया.

जीत के बावजूद, शिवाजी अपने सबसे सक्षम कमांडर और दोस्त को खोने से काफी परेशान हुए और उनके मुख से निकल पड़ा - गढ़ आला पण सिंह गेला अर्थात् "गढ़ तो हाथ में आया, परन्तु मेरा सिंह (तानाजी) चला गया. उन्होंने तानाजी के सम्मान में कोंधाना किले का नाम सिंहगढ़ किले के रूप में बदल दिया क्योंकि वे तानाजी को ‘सिंह’ कहा करते थे.

तानाजी मालुसरे ऐसे योद्धा हुए जिन्होंने अपने पुत्र के विवाह और अपने परिवार की भी प्रवाह न करते हुए भी शिवाजी महाराज की आज्ञा मानी और सिंहगढ़ किले की लड़ाई लड़ी और जीत भी हासिल कर वाई. ऐसे महान योद्धा की वीरता को महाराष्ट्र और सम्पूर्ण भारत में याद किया जाता है.

छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा लड़े गये विभिन्न लड़ाइयों की सूची

छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा लड़े गये विभिन्न लड़ाइयों की सूची

17वीं सदी के शुरुआत में मराठों के एक नए सैन्य वर्ग का उत्थान हुआ, जब पुणे के भोसले परिवार ने अहमदनगर साम्राज्य से सैन्य और राजनीतिक लाभ प्राप्त किया। भोसले परिवार ने स्थानीय होने का लाभ उठाते हुए कई विशेषाधिकार प्राप्त किए और अपनी सेना में बड़ी संख्या में मराठा सरदार और सैनिकों की भर्ती की। शिवाजी एक निपुण सैनिक और कुशल प्रशासक थे। यहां, हम सामान्य जागरूकता के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा लड़े गए विभिन्न लड़ाइयों की सूची दे रहे हैं।
OCT 18, 2017 12:59 IST

17वीं सदी के शुरुआत में मराठों के एक नए सैन्य वर्ग का उत्थान हुआ, जब पुणे के भोसले परिवार ने अहमदनगर साम्राज्य से सैन्य और राजनीतिक लाभ प्राप्त किया। भोसले परिवार ने स्थानीय होने का लाभ उठाते हुए कई विशेषाधिकार प्राप्त किए और अपनी सेना में बड़ी संख्या में मराठा सरदार और सैनिकों की भर्ती की। शिवाजी एक निपुण सैनिक और कुशल प्रशासक थे। यहां, हम सामान्य जागरूकता के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा लड़े हुए विभिन्न लड़ाइयों की सूची दे रहे हैं।

Chhatrapati Shivaji Maharaj

Source: www.whoa.in

छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा लड़े गये विभिन्न लड़ाइयों की सूची

युद्ध का नाम

विवरण

प्रतापगढ़ की लड़ाई

10 नवंबर, 1695 को छत्रपति शिवाजी महाराज और आदिलशाही जनरल अफजल खान की सेनाओं के बीच सतारा, महाराष्ट्र के निकट प्रतापगढ़ के किले में के पास हुयी थी।

कोल्हापुर की लड़ाई

28 दिसंबर, 1696 को कोल्हापुर शहर के मराठा छत्रपति शिवाजी और आदिलशाही सैनिको के बीच हुआ था।

पवन खंद की लड़ाई

13 जुलाई 1660 को किला विशालगड़ के पास मराठा सरदार बाजी प्रभु देशपांडे और आदिलशाह के सिद्दी मसूद के बीच हुआ था।

चकन की लड़ाई

1660 में मराठा साम्राज्य और मुगल साम्राज्य के बीच में हुआ था।

अम्बरखिंड का युद्ध

2 फरवरी 1661 को छत्रपति शिवाजी के अधीन मराठा और मुगलों के कार्तलब खान के बीच हुआ।

सूरत की बर्खास्तगी

5 जनवरी 1664 को छत्रपति शिवाजी महाराज और मुगल कप्तान इनायत खान के बीच सूरत शहर के पास हुआ था।

पुरंदर की लड़ाई

1665 में मुगल साम्राज्य और मराठा साम्राज्य के बीच में हुआ था।

सिंहगढ़ की लड़ाई

4 फरवरी, 1670 को पुणे शहर, महाराष्ट्र के निकट सिंहगढ़ के किले के पास, मराठा शासक शिवाजी महाराज और उदयभान राठोड़ के बीच में हुआ था।

कल्याण की लड़ाई

1682 से 1683 तक युद्ध चला, जिसमें मुगल साम्राज्य के बहादुर खान ने मराठा सेना को हराया।

भूपलगढ़ की लड़ाई

1697 में मुगल और मराठा साम्राज्यों के बीच हुआ था, जिसमें मुगल ने मराठों को हराया था।

संगमनेर की लड़ाई

1698 में मुगल साम्राज्य और मराठा साम्राज्य के बीच हुआ था और शिवाजी महाराज की यह आखिरी लड़ाई थी।

शिवाजी महाराज के उत्तराधिकारी

शिवाजी ने 18 साल की उम्र में अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी थी और उन्होंने पूना, रायगढ़, कोंडाणा और तोरना के पास कई पहाड़ी किलों पर कब्जा कर लिया था। उन्होंने 1656 में मराठा प्रमुख चंद्र राव के विरूद्ध विजय प्राप्त कर जाबली के किले को अपने कब्जे में कर लिया था। जाबली के किले पर विजय प्राप्त करने के कारण मावल क्षेत्र में उनका एकछत्र साम्राज्य स्थापित हो गया था, जिसके बाद उन्होंने सातारा और कोंकण के तटीय क्षेत्र में अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए अपने कदम बढ़ाए. छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा लड़े लड़ाइयों की उपरोक्त सूची से पाठकों के सामान्य ज्ञान में वृद्धि होगी।

आधुनिक भारत का इतिहास: सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री

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